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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 27 · 35/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 27 · Kirtan 27

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

39 source linesपुस्तक पृष्ठ 71–73PDF 88–90

धनि धनि प्रेम धनि धनि नँदनंदन,

(तू ही तू ही..)

धनि धनि प्रेम धनि धनि नँदनंदन,

करु वंदन प्रेम अरु नँदनंदन।

होड़ जब होय प्रेम अरु नँदनंदन,

जीते नित प्रेम हारे नित नँदनंदन।

श्रुति कह जग के पिता हैं नँदनंदन,

प्रेम ने बनाया वाय ब्रज नँदनंदन।

श्रुति कह भूख प्यास नहिं नँदनंदन,

प्रेम ने बनाया भूखा प्यासा नँदनंदन।

जाको नाम जपि जन काटे भव बंधन,

Source page 72

सोइ ऊखल बँधा माँगे मुक्ति गोपी जन।

नाचेें जाकी माया वश बड़े बड़े ज्ञानी जन,

सोइ गोपी छाछ पर नाचे नँदनंदन।

श्रुति करें अस्तुति जेहि नँदनंदन,

सोइ तुतुराय बतराय गाय बछरन।

जो न जाय शंभुहूँ समाधि नँदनंदन,

सोइ गारी खाने जाय घर घर गोपी जन।

जाको कह वेद है अजित नँदनंदन,

सोइ पायो रणछोर नाम नँदनंदन।

श्रुति कह आनँदकंद नँदनंदन,

सोइ माय गोद हित रोये नँदनंदन।

श्रुति कह डर डरे डर नँदनंदन,

सोइ माय साँटी लखि डरे नँदनंदन।

श्रुति कह नेति नेति नेति नँदनंदन,

वाको गोपी कह चौर जार नँदनंदन।

श्रुति कह जग वंदन नँदनंदन,

सोइ करे नित राधारानी पद वंदन।

उमा रमा चापें पग जेहि नँदनंदन,

राधारानी पग चापें सोइ नँदनंदन।

Source page 73

श्रुति कह वेद वेद्य जेहि नँदनंदन,

सोइ गोपन बने घोड़ा नँदनंदन।

श्रुति कह बुधि पर जेहि नँदनंदन,

उठवावें गोबर टोकरि गोपीजन।

उर लाना चाहे जेहि योग बल योगी जन,

सोइ राधा को मनावें रो के नँदनंदन।

जो है सारे जग का ही दाता नँदनंदन,

सोइ बना राधा का भिखारी नँदनंदन।

सनकादि कृपा चह जेहि नँदनंदन,

राधा कृपा चह सो “कृपालु” नँदनंदन।

ब्रज रस माधुरी · भाग २035
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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