कीर्तन 1–50
कीर्तन 27 · Kirtan 27
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
धनि धनि प्रेम धनि धनि नँदनंदन,
धनि धनि प्रेम धनि धनि नँदनंदन,
होड़ जब होय प्रेम अरु नँदनंदन,
जीते नित प्रेम हारे नित नँदनंदन।
श्रुति कह जग के पिता हैं नँदनंदन,
प्रेम ने बनाया वाय ब्रज नँदनंदन।
श्रुति कह भूख प्यास नहिं नँदनंदन,
Source page 72
सोइ ऊखल बँधा माँगे मुक्ति गोपी जन।
नाचेें जाकी माया वश बड़े बड़े ज्ञानी जन,
श्रुति करें अस्तुति जेहि नँदनंदन,
जो न जाय शंभुहूँ समाधि नँदनंदन,
सोइ गारी खाने जाय घर घर गोपी जन।
सोइ माय साँटी लखि डरे नँदनंदन।
श्रुति कह नेति नेति नेति नँदनंदन,
Source page 73
श्रुति कह वेद वेद्य जेहि नँदनंदन,
श्रुति कह बुधि पर जेहि नँदनंदन,
उर लाना चाहे जेहि योग बल योगी जन,
सोइ राधा को मनावें रो के नँदनंदन।
जो है सारे जग का ही दाता नँदनंदन,
