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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 96 · 104/142

कीर्तन 51–100

कीर्तन 96 · Kirtan 96

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

53 source linesपुस्तक पृष्ठ 241–244PDF 258–261

किया कैसा जादू पिया जादूगर सरदार।

(नथवारी रंगीली...)

किया कैसा जादू पिया जादूगर सरदार।

मैं तो मरि गइ बिनुहिं मौत लखि यार।

गइ वंशीवट तट तहँ रह रिझवार।

वाने कही सुन सुन सुन ओ ब्रजनार।

मोरी तोरी भल जोरी मोरी ओर निहार।

मैं कछु नहिं बोली लिय मौनहिं धार।

तब मो ढिंग आयो निलज जार।

औचक दिय घूँघट पट उघार।

हौं बोली हट लंपट गमार।

सो कह हौं ही हौं तेरो यार।

दे गारी या करु मोय प्यार।

Source page 242

पाछा नहिं छोडूँ अब तिहार।

तजु लोक लाज भजु साँचो यार।

हौं बोली हौं पतिव्रता नार।

सूधे जा चला आपुने द्वार।

मेरा पति मोटी लट्ठ धार।

तेरी ठकुराई ले निकार।

तोहिं जाने सब प्रख्यात जार।

तू अरु तेरे ग्वारहुँ गमार।

तू का जाने रस प्यार वार।

तू तो है लबरन को सरदार।

लै दर्पण टुक निज मुख निहार।

तो कारे सों को करे प्यार।

सो कह ओ छवि गर्वीली नार।

तोहिं निज छवि को बड़ अहंकार।

पुनि कत डरपति नहिं मोहिं निहार।

यह सुनि हौं उर अति रोष धार।

हौं कह ले हौं इकटक निहार।

पुनि वाने नैनन सैन मार।

लखि नैन सैन हौं सुधि बिसार।

Source page 243

दिय तुरतहिं तन मन प्राण हार।

सो कह सखि कैसा लगा वार।

अब तो लागी उर आग प्यार।

यह यारी अब नहिं छुटै यार।

यह यारी सखि परकीया प्यार।

चोरी चोरी किये बढ़े प्यार।

पुनि हौं तेहिं सो मोहिं निहार।

इमि हेरत दोउन भइ अबार।

तब इक सखि कह तनु सुधि सँभार।

तब हौं लीन्यो घूँघट पट डार।

मन कह पुनि घूंघट पट उघार।

बुधि कह नहिं धरे नाम संसार।

टेर्यो तब मनसुख नंदकुमार।

उत गयो मनसुख ढिंग पिय रिझवार।

इत रोम रोम रमी छवि रिझवार।

पल पल तलफत पुनि लखन यार।

नहिं भावे अब जग नातेदार।

लग खारो खारो सब संसार।

मन समुझावत हौं गई हार।

Source page 244

मानत नहिं मन चह सोइ यार।

तू ही सखि करु अब कछु उपचार।

तू धनि “कृपालु” धनि तेरो प्यार॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २104
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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