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मेरी राधा रानी हैं अवढर दानी।
(नथवारी रंगीली...)
मेरी राधा रानी हैं अवढर दानी।
जाकी श्री वृन्दावन रजधानी।
जो दिव्य प्रेम रस की खानी।
जो वृन्दावन की ठकुरानी।
जो चिन्मय रूप राशि खानी।
छवि लाजत लखि छवि महरानी।
जो बिनु कारण ब्रजरस दानी।
जो ठाकुर हूँ की ठकुरानी।
जेहि महिमा श्रुति हूँ नहिं जानी।
जाकी ब्रह्म श्याम करें अगवानी।
जेहि पद रज चह कमला वानी।
जेहि कृपा चहत सारँग पानी।
जेहि ब्रह्म श्याम स्वामिनि मानी।
जेहि शरणागत सारँग पानी।
जेहि पग धर सिर सारँग पानी।
जाके चापें पग नित सारँग पानी।
Source page 163
पुनि पुनि बन मानिनि महरानी।
पग पकरि मनाव चक्रपानी।
जेहि डर डरपत सारँग पानी।
जेहि कर जयकार चक्रपानी।
जेहि लखि मुर्छित सारँग पानी।
जो पतित पावनी महरानी।
जो दीनन रक्षक ठकुरानी।
जो प्रणत प्रेम रस की दानी।
अति कृपामयी राधारानी।
भोरी भारी राधारानी।
सरलातिसरल राधारानी।
मोहन मोहिनि राधारानी।
झर रोम रोम रस महरानी।
विधि हरि हर निज स्वामिनि मानी।
करुणा मूरति राधा रानी।
कारुण्यामृत तनु राधा रानी।
तारुण्यामृत तनु राधा रानी।
लावण्यामृत तनु राधा रानी।
प्रेमाधिष्ठात्री महरानी।
Source page 164
कोमल ते कोमल महरानी।
नहिं लख जन अवगुन महरानी।
वनचरिन सखिन किय ठकुरानी।
रस को दे रस अस महरानी।
जग जननी हैं राधारानी।
जग व्यापक हैं राधारानी।
जग ते अतीत राधारानी।
जग की रक्षक राधारानी।
दासी “कृपालु” कर ठकुरानी॥
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