Skip to main content

वेद तत्व परब्रह्म बताय।
(नीको लागे...)
वेद तत्व परब्रह्म बताय।
ब्रह्म अभिन्न रूप द्वै आय।
एक रूप साकार कहाय।
निराकार इक रूप बताय।
कृष्ण रूप साकार बताय।
निराकार तो ब्रह्म बताय।
कृष्ण उपासक भक्त कहाय।
ब्रह्म उपासक ज्ञानी आय।
जीव चराचर जेतिक आय।
Source page 39
भक्तिहिं अधिकारी बतलाय।
साधन चार युक्त जो आय।
ज्ञानहिं अधिकारी बतलाय।
भाव प्रथम मन शुद्ध कराय।
कृष्ण भक्ति मन शुद्ध कराय।
भक्ति मार्ग निष्कंटक आय।
आँख मूँदि पथ भाजत जाय।
वाको साथ देत बलभाय।
याते पतन न होने पाय।
यह प्रण गीता माहिँ बताय।
ज्ञान पथिक निज बल ते जाय।
याते बार बार गिरि जाय।
ब्रह्म ज्ञान ज्ञानी नहिं पाय।
मोक्ष लाभ ज्ञानी नहिं पाय।
कारण माया वाय न जाय।
द्वै माया का रूप बताय।
विद्या तथा अविद्या आय।
सत्व गुणी विद्या कहलाय।
रज तम गुणी अविद्या आय।
Source page 40
ज्ञानिहुँ की विद्या न नसाय।
बिनु हरि भक्ति न विद्या जाय।
ज्ञानिहुँ भक्ति अपेक्षा आय।
निर्गुण ब्रह्म वेद बतलाय।
वाते ज्ञानी कृपा न पाय।
कृपा हेतु भक्तिहिं अपनाय।
तब हरि कृपा मुक्ति पद पाय।
मुक्तहुँ प्रेमानंद न पाय।
प्रेमानंद हेतु ललचाय।
कोटिन मुक्तन कोउ इक पाय।
भक्ति अधीन ब्रह्म बलभाय।
ब्रह्म अधीन मोक्ष कहलाय।
सोइ लक्ष्य ज्ञानिन कहलाय।
भक्त न चाहत मुक्ति बलाय।
मुक्ति पिशाचिनि भक्त बताय।
ज्ञान व्यर्थ बिनु भक्ति सदाय।
भक्ति रेवैनं श्रुति बतलाय।
भाव भक्ति ही हरि मिलवाय।
करहु “कृपालु” भक्ति बलभाय॥
❦
Source, meanings & reading links