कामरि वारे पै का मरि जाय।
(नीको लागे...)
कामरि वारे पै का मरि जाय।
कारो रंग अति निंदनीय बलभाय।
कारो नर सालिगराम कहाय।
देवकी यशोदा याय द्वै द्वै माय।
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वसुदेव नंद द्वै द्वै बाप बताय।
कोउ क्षत्रिय कोउ वैश्य बताय।
अनपढ़ अँगुठा छाप बलभाय।
सँगहुँ नित ग्वार गमारन पाय।
जग अगनित प्यारी वाय आय।
गति मति रति चंचल बलभाय।
परम स्वतंत्र करे मनभाय।
प्रेम रस मदिरा मत्त सदाय।
चौर सिर मौर सब रसिक बताय।
माखन चोर सखिन बतलाय।
शरणागत चित चोर कहाय।
गोपिन वसन चोर कहलाय।
चित चोरे छलिया नैन मिलाय।
प्रणत सुकृत दुष्कृतहुँ चुराय।
अति कपटी सुभाय बलभाय।
जार शिखामणि संत बताय।
छोटो सो नैनन बान चलाय।
दधि दान माँगे मग सखिन सताय।
सखि दधि ना दे तो ले सखन लुटाय।
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सब सोँ ही कह मेरी प्यारी बलभाय।
काउ सखि चुनरिहिँ फारे मग आय।
काउ सखि गागरि फोरे बलभाय।
काउ मोतिन लर तोरे बलभाय।
सब सोँ ही झूठी मूठी बात बनाय।
मैया सोँ भी झूठ बोले बलभाय।
छीके पहुँचे न तो बड़ो ह्वै जाय।
सखि पकरे तो वाय पति बनि जाय।
ब्रज घर घर कर लँगरई जाय।
जो बरजे वाय जीभ दिखाय।
जितनोइ छोटो खोटो तितनोइ आय।
मथुरा में जनमेउ कारागार आय।
छल करि प्रहरिन दीन सुलाय।
माया ते यमुना को दीनो सुखाय।
छल करि आधी रात गोकुल जाय।
तहँ यशुमति छलि माय बनाय।
मैया को मुख महँ विश्व दिखाय।
जहँ बस न चले योगमाया बुलाय।
कारी करतूति सारी कौन गनाय।
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तीन पग भूमि माँगि छल्यो बलि जाय।
छल बाँधि बलि पाताल पठाय।
तरु ओट छुपि मार्यो बाली बलभाय।
छल सोँ ही मार्यो कौरव बलभाय।
छल सोँ ही मार्यो ब्रज असुरन आय।
कह लौँ “कृपालु” वाय अवगुन गाय॥