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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 116 · 124/142

कीर्तन 101–134

कीर्तन 116 · Kirtan 116

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

45 source linesपुस्तक पृष्ठ 290–292PDF 307–309

मैं तो लुटि गई बीच बजार सखी।

(नथवारी रंगीली...)

मैं तो लुटि गई बीच बजार सखी।

मैं तो खरी रही यमुना के पार सखी।

मैं तो लखि रही यमुना की धार सखी।

आयो कतहूँ ते नंदकुमार सखी।

वाने मोते कही सुनु ब्रज नार सखी।

तू तो जाने तेरी सास खाय खार सखी।

मोते कही काहे कीनी अबार सखी।

जा लिवा ला मारूँ बेलन मार सखी।

भोरी मैं भी चली सँग रिझवार सखी।

मग वाने गल बहिँयन डार सखी।

वाके परस ने दिया जादू डार सखी।

Source page 291

मैंने देखा वाय घुँघटा उघार सखी।

फिर क्या था ह्वै गये दृग चार सखी।

वाने किये सैनन सों वार सखी।

मैं तो गइ तन मन सब हार सखी।

पुनि उर ते लगाया रिझवार सखी।

पुनि मोते कही तू भी कर प्यार सखी।

मैं तो तनु सुधि सकी न संभार सखी।

गिरी मुर्छित धरणि मझार सखी।

इतने में आईं मेरी सखी चार सखी।

उनने ही उठाया किया प्यार सखी।

वो तो झूठा तजि भजि गया जार सखी।

मैंने सखी को बताया प्यार जार सखी।

कही सखी ने मैं जानूँ वाय जार सखी।

वो तो सब को ही ठगे ठगहार सखी।

वो तो लबरन को सरदार सखी।

वो तो सब ते ही करे दृग चार सखी।

वो तो ब्रज को बड़ों ही बटमार सखी।

वो तो कपट रूप साकार सखी।

वाते विधि हरि हर गये हार सखी।

Source page 292

वाको लखि उमा रमा बलिहार सखी।

जो भी देखे वाय नैन सैन मार सखी।

निज पतिव्रत धर्म विचार सखी।

मानु मेरी वाय मन से निकार सखी।

अभी तो है दूर दूर का ही प्यार सखी।

अब लखु न कबहुँ रिझवार सखी।

मग चलु निज घूँघट डार सखी।

काननहूँ में रूई डार सखी।

वाकी मुरलिहुँ जादू डार सखी।

सँग लै चलु सखि दुइ चार सखी।

मोय अब तो ह्वै गयो प्यार सखी।

छुटे नहिं करु यतन हजार सखी।

बसि गयो रोम रोम रिझवार सखी।

तू तो छुपि के “कृपालु” करु प्यार सखी॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २124
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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