कीर्तन 51–100
कीर्तन 97 · Kirtan 97
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
चलु चलु चलु तजु अंचल चंचल।
लखि सखि गिरे तोरे मुख राल चंचल।
तू तो लखि सखि बने जनु रंक चंचल।
तोहिं डर नहिं लोकहुँ कहँ चंचल।
Source page 245
झूठ का तो है तू रूप साकार चंचल।
तू न देखे अनब्याही ब्याही कछु चंचल।
तोहिं नारी कारी कुबरिहुँ भाये चंचल।
तू तो जाने जादू टोना चेटक चंचल।
तेरी आँखों में न जाने कैसा जादू चंचल।
जो भी देखे गिरे भू पे कहे हाय चंचल।
तू ने ब्रज महँ अति करि दीनी चंचल।
अति अति बुरी होती तू न जाने चंचल।
काउ दिन या को पावे फल भल चंचल।
तो सोँ हारी सबरी ब्रजनारी चंचल।
तोहिं सीधा कर देंगी पल महँ चंचल।
नहिं माने तो चला जा अभी हाल चंचल।
तोहिं निज छवि को है बड़ो मद चंचल।
Source page 246
अब हम सब लेंगी दाँव तो सों चंचल।
सेर को मिलेगा तब सवा सेर चंचल।
तू भी रोयेगा सखिन ढिंग तब चंचल।
हा हा खायेगा परेगा पैयाँ सखि चंचल।
