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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 108 · 116/142

कीर्तन 101–134

कीर्तन 108 · Kirtan 108

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

31 source linesपुस्तक पृष्ठ 271–272PDF 288–289

पिय फोरी मोरी गागरि बरजोरी।

(नथवारी रंगीली...)

पिय फोरी मोरी गागरि बरजोरी।

कर जोरी नहिं मान्यो कोउ बरजोरी।

घर ते निकरन दूभर गोरी।

तट यमुन भरन गइ घट कोरी।

तहँ लख्यो ठढ़ो नटवर कोरी।

मोसोँ कह सुनु ओरी गोरी।

तू बन जा सब दिन को मोरी।

हौँ कह तू कारो हौँ गोरी।

पुनि जानति करतूतहिँ तोरी।

चल हट लंपट जा निज पोरी।

भूलेहुँ जनि लखु मोरी ओरी।

हौँ ऐसी वैसी नहिं गोरी।

तू कर घर घर माखन चोरी।

माँगत दधि सखियन ब्रज खोरी।

जो सखि ना दे वा घट फोरी।

Source page 272

काहुहिँ खोले घूँघट को री।

काहुहिँ बोले जोरी मोरी।

काहुहिँ सिर चूनरि ले छोरी।

काहुहिँ मारे सैनन को री।

काहुहिँ गर लर मोतिन तोरी।

चल लै लख सँग सखन को री।

चोरी करि भाजे निज पोरी।

लखतहिँ लै सखियन चित चोरी।

छलि ले मृदु बोलनि सखि भोरी।

पी लइ सब लोक लाज घोरी।

सब सोइ कह लखु मोरी ओरी।

हौँ ही तव पति कह सब सोँ री।

लखि इकली सखि छेड़त सो री।

मग महँ उर लावत बरजोरी।

चलु कहुँ “कृपालु” तजु ब्रज गोरी॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २116
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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