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पिय फोरी मोरी गागरि बरजोरी।
(नथवारी रंगीली...)
पिय फोरी मोरी गागरि बरजोरी।
कर जोरी नहिं मान्यो कोउ बरजोरी।
घर ते निकरन दूभर गोरी।
तट यमुन भरन गइ घट कोरी।
तहँ लख्यो ठढ़ो नटवर कोरी।
मोसोँ कह सुनु ओरी गोरी।
तू बन जा सब दिन को मोरी।
हौँ कह तू कारो हौँ गोरी।
पुनि जानति करतूतहिँ तोरी।
चल हट लंपट जा निज पोरी।
भूलेहुँ जनि लखु मोरी ओरी।
हौँ ऐसी वैसी नहिं गोरी।
तू कर घर घर माखन चोरी।
माँगत दधि सखियन ब्रज खोरी।
जो सखि ना दे वा घट फोरी।
Source page 272
काहुहिँ खोले घूँघट को री।
काहुहिँ बोले जोरी मोरी।
काहुहिँ सिर चूनरि ले छोरी।
काहुहिँ मारे सैनन को री।
काहुहिँ गर लर मोतिन तोरी।
चल लै लख सँग सखन को री।
चोरी करि भाजे निज पोरी।
लखतहिँ लै सखियन चित चोरी।
छलि ले मृदु बोलनि सखि भोरी।
पी लइ सब लोक लाज घोरी।
सब सोइ कह लखु मोरी ओरी।
हौँ ही तव पति कह सब सोँ री।
लखि इकली सखि छेड़त सो री।
मग महँ उर लावत बरजोरी।
चलु कहुँ “कृपालु” तजु ब्रज गोरी॥
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