कीर्तन 51–100
कीर्तन 98 · Kirtan 98
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
छल किया पिया छलि लिया मन छलिया।
छल किया पिया छलि लिया मन छलिया।
जा जा जान लिया भल तोरा छल छलिया।
Source page 247
तू है प्राण प्यारी यह भी कहा था छलिया।
जाने कैसा जादू किया कुबरी ने छलिया।
नहिं आया नहिं मोहिं बुलाया छलिया।
कब आवूँगा न यह भी बताया छलिया।
मैंने माना मैंने बहुत सताया छलिया।
बार बार किया तोरा अपमान छलिया।
दई बार बार गारी ब्रज नारी छलिया।
बार बार था नचाया छाछ दे के छलिया।
दिया मैया सों उरहनो तोरा छलिया।
तो को भला बुरा बहुत कहा छलिया।
तेरे प्रेम ने किया बेसुध छलिया।
तू तो जाने प्रेम में ऐसो होय छलिया।
पुनि काहे हम सब कहँ तज्यो छलिया।
Source page 248
तू तो मेरी नस नस बस गया छलिया।
जित देखूँ तित तू ही तू ही दीखे छलिया।
कान “प्यारी” आदि शब्द तेरे सुने छलिया।
नासिका तनु दिव्य गंध सूँघे छलिया।
रोम रोम तेरा परस दिलाये छलिया।
मन तेरे बिनु कछु नहिं सोचे छलिया।
मेरी आत्मा में तू है समाया छलिया।
तेरे जाने से न भयो कछु टोटो छलिया।
मोहिं तेरे अपयश का है डर छलिया।
तोहिं निठुर कहेंगे जग वारे छलिया।
मोहिं विरह न यह कोउ माने छलिया।
मधुपुरी ही न तू जा गोलोक छलिया।
मैं तो तेरी थी हूँ रहूँगी सदा छलिया।
तेरे विरह में मिलन को रस छलिया।
