कीर्तन 101–134
कीर्तन 110 · Kirtan 110
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भाय गयो भाय गयो भाय गयो बलभाय।
भाय गयो भाय गयो भाय गयो बलभाय।
अब जग सुख नहिं मोहिं नेकु सुहाय।
वाने कही वोरी गोरी टुक सुनु इत आय।
हौँ बोली बोल बोल मोय काहे को बुलाय।
वाने कही बात कान में कहन की आय।
यह सुनि मैं भी गइ वाय ढिंग बलभाय।
वाने कही चलु सँग तेरी माय ने बुलाय।
Source page 276
आजु अभी अभी मेरे घर आई तेरी माय।
पुनि उर ते लगा के भेंटी तेरी मेरी माय।
पुनि खुसुर खुसुर दोउ लागी बतराय।
करूँ आजु ही सगाई इमि कह दोउ माय।
पुनि हँसि तेरी माय ते बोली मेरी माय।
निज लाली को बुला दे देखूँ मैं भी छवि वाय।
जा बुला ला लाला लाली मोते कही तेरी माय।
मैं तो चाहता ही था कि तू भी मेरी बनि जाय।
कहा तू भी मोहिं चाहती थी साँचु बताय।
मैं बोली नहिं कछु चली सँग बलभाय।
मोहिँ मग में अकेली लखि सोइ बलभाय।
गलबाँही दे के लिय मोहिं उर ते लगाय।
वह सुख सखि मुख ते नहिं कहि जाय।
मैंने सोची अब तो बने पिय बलभाय।
याते मैंने भी लगाया उर वाय बलभाय।
मैं भूली सुधि रंकिनि पारस पाय।
पुनि बार बार दोउ दोउ उर ते लगाय।
Source page 277
तनु निकसे पसीना रोम रोम हरषाय।
मिल्यो एतिक सुख सखि उर न समाय।
कैसेहुँ गई धीरे धीरे सँग बलभाय।
जब आयो घर पास तब बोल्यो बलभाय।
तू तो चलु अलि आगे तोहिं देखे मेरी माय।
मैं भी आवूँ अभी उत मोहिं सखन बुलाय।
मैं जो गई घर देखा तहँ नहिं वाय माय।
मैंने पूछा यशुमति इत आई कहा माय।
नहिँ नहिँ इत कोउ नहिँ आई कह माय।
काहे पूछे कहा बात है बता दे कह माय।
मैंने बात बताई जो जो करी बलभाय।
माय बोली वो तो झूठा वाय काहे पतियाय।
