कीर्तन 51–100
कीर्तन 91 · Kirtan 91
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ओरी मोरी सखि लूट्यो मोहिं भल बलभाय।
ओरी मोरी सखि लूट्यो मोहिं भल बलभाय।
कालि आधी रात आयो मेरे द्वार बलभाय।
आके मेरे द्वार बार बार कुंडी खटकाय।
मैंने पूछी आधी रात कौन कुंडी खटकाय।
वाने कही मैं हूँ मैं हूँ मैं हूँ मैं हूँ बलभाय।
Source page 229
तेरे मायके का आया कोई बोला बलभाय।
वाने तेरी कुंडी खटकाई बार बार जाय।
तेरी नींद ते तो कुंभकर्ण नींदहूँ लजाय।
तू न जागी तब हारि वह मेरे द्वार आय।
आके मेरे द्वार पुनि पुनि कुंडी खटकाय।
मैंने खोलि के किवार पूछा कौन तू बताय।
मैंने कहा आओ बैठो यह तेरो घर आय।
अभी अभी जाके लावूँ वो तो मेरी भाभी आय।
सखि चलु मेरे सँग दउँ भाय मिलवाय।
मैंने सोची साँची आयो होगो मेरो बड़ भाय।
मैं भी चली द्रुत वाके सँग मिले मेरो भाय।
वाने प्रथमहिं दिये कुंज सखन बिठाय।
मैं तो जा रही थी निधरक सँग बलभाय।
इतने में बोले नासिका से सखा समुदाय।
तुम दोनों को ही खावूँ अभी अभी उत आय।
मैं तो डरि गई गइ उर लगि बलभाय।
Source page 230
पुनि मेरी प्यारी कहि बार बार चिपटाय।
पुनि कही भूतों टुक मेरे सामने तो आय।
पुनि पुनि वाने पुनि मोय उर ते लगाय।
वह सुख सखि मुख ते न कहि सक जाय।
मेरो मन कह तू भी वाय उर ते लगाय।
मेरे रोम रोम बसि गयो सोइ बलभाय।
तन मन प्रान सब लियो लूटि बलभाय।
तब द्रुत घर घुसि गयो सो बलभाय।
पुनि कह जा जा घर इत कोउ नहिं आय।
मैंने कही इकली कैसे जावूँ बलभाय।
कर जोरि कहूँ चलु सँग घर पहुँचाय।
न तु मिले सोइ भूत खाय मोहिँ बलभाय।
पुनि आयो दियो गल बहिँयन बलभाय।
