कीर्तन 101–134
कीर्तन 115 · Kirtan 115
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मैं तो लुटि गइ लुटि गइ लुटि गइ यार।
मैं तो लुटि गइ लुटि गइ लुटि गइ यार।
वाने सब कछु लूटा नहिं छोड़ा कछु यार।
मैंने घट भरा सिर धरा चली घर यार।
वाने मेरे घट झट मार्यो कांकरि यार।
मैंने देखा पाछे कोउ नहिं दीखा मोय यार।
वाने जाने कैसी मुरलि बजाई छुपि यार।
मैं तो मरि गइ धुनि सुनि मुरली की यार।
पुनि आयो कहा कौन फोरा घट तोरा यार।
मैंने कही इत तेरे सिवा छोरा कौन यार।
मैंने देखा निज घुँघटा उठा के वाय यार।
मोरा तन मन प्रान सब लुट गया यार।
तनु सुधि भूली गिरी छिति मुर्छित यार।
Source page 289
जब भई चेतना तो उठि देखा चहुँ यार।
सब सखि पूछे हुआ क्या बता दे मोय यार।
भला कैसे मैं बताऊँ वाय जार प्यार यार।
साँची साँची कहु मैं तो तेरी साँची सखि यार।
मैंने कही पिया किया नैन बान वार यार।
सखि बोली वाने तोरा घट फोरा होगा यार।
ले ले मेरा घट जा झट निज घर यार।
तेरी सासु बड़ी तेज मारे बेलन यार।
जइयो घूँघट में सिर नीचे करि अब यार।
मैं भी पुनि घट भरि चलि निज घर यार।
आयो पुनि सोइ डगर लुटेरा मेरा यार।
वाने कही तू तो अब मोरी ह्वै गइ यार।
अब घुँघटा हटा के लखु इकटक यार।
मैंने मानी बुधि की गइ निज घर यार।
Source page 290
बिनु देखे कल नहिं इक पल कहँ यार।
