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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 58 · 66/142

कीर्तन 51–100

कीर्तन 58 · Kirtan 58

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

21 source linesपुस्तक पृष्ठ 149–150PDF 166–167

मम स्वामिनि श्यामा भाम, जाकर चाकर घनश्याम।

(हैं बाँको सुन्दर...)

मम स्वामिनि श्यामा भाम, जाकर चाकर घनश्याम।

प्रकटीँ बरसानो धाम, जो दिव्य धाम अभिराम॥

श्यामा जू छवि रस धाम, लाजति लखि छवि छविधाम।

वृन्दावन लीला धाम, कर नित्य रास सँग श्याम॥

सोरह शृंगार ललाम, लखि तनु सुधि भूलेँ श्याम।

तनु चिदानंद सुखधाम, सँग कोटि कोटि ब्रजबाम॥

वारौं कोटिन रति काम, बरसावति रस ब्रजधाम।

ललितादिक लख लख बाम, सेवत नित आठोँ याम॥

Source page 150

नहिँ भुक्ति मुक्ति मन काम, नहिँ चह बैकुण्ठहुँ धाम।

चह स्वामिनि बनि ब्रजबाम, सेवहुँ तोहिँ आठोँ याम॥

तव शरणागत ह्वै श्याम, रिझवत तोहिँ आठोँ याम।

कभु बनि मनिहारिनि श्याम, कभु बनि लिलिहारिनि बाम॥

मानिनिहिं मनावत श्याम, रोवत सिर धरि तव पाम।

तव लखत भौंह अविराम, डरपत तव डर घनश्याम॥

चापत नित तव युग पाम, निज भाग मानि बड़ श्याम।

तव डगर बुहारत श्याम, बोलत जय जय लै नाम॥

राधा राधा वसु याम, मुरली महँ गावत श्याम।

दसहूँ दिसि देखत श्याम, राधा छवि आठोँ याम॥

सोइ देहु प्रेम निष्काम, जेहि दिये सबहिं ब्रजबाम।

तजि सब “कृपालु” जग काम, ध्यावूँ तोहिँ गावूँ नाम॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २066
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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