कीर्तन 51–100
कीर्तन 58 · Kirtan 58
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मम स्वामिनि श्यामा भाम, जाकर चाकर घनश्याम।
मम स्वामिनि श्यामा भाम, जाकर चाकर घनश्याम।
प्रकटीँ बरसानो धाम, जो दिव्य धाम अभिराम॥
श्यामा जू छवि रस धाम, लाजति लखि छवि छविधाम।
वृन्दावन लीला धाम, कर नित्य रास सँग श्याम॥
सोरह शृंगार ललाम, लखि तनु सुधि भूलेँ श्याम।
तनु चिदानंद सुखधाम, सँग कोटि कोटि ब्रजबाम॥
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नहिँ भुक्ति मुक्ति मन काम, नहिँ चह बैकुण्ठहुँ धाम।
चह स्वामिनि बनि ब्रजबाम, सेवहुँ तोहिँ आठोँ याम॥
तव शरणागत ह्वै श्याम, रिझवत तोहिँ आठोँ याम।
कभु बनि मनिहारिनि श्याम, कभु बनि लिलिहारिनि बाम॥
मानिनिहिं मनावत श्याम, रोवत सिर धरि तव पाम।
तव लखत भौंह अविराम, डरपत तव डर घनश्याम॥
चापत नित तव युग पाम, निज भाग मानि बड़ श्याम।
तव डगर बुहारत श्याम, बोलत जय जय लै नाम॥
राधा राधा वसु याम, मुरली महँ गावत श्याम।
दसहूँ दिसि देखत श्याम, राधा छवि आठोँ याम॥
