कीर्तन 101–134
कीर्तन 118 · Kirtan 118
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मैंने जब ते लखी है सखी दृग बलभाय।
मैंने जब ते लखी है सखी दृग बलभाय।
जग फीको लागे नीको लागे सोइ बलभाय।
जित देखूँ तित दीखे सोइ दृग बलभाय।
हिय उठति हूक पुनि पुनि कहि हाय।
Source page 296
मेरी नींदिहुँ लै गयो सँग बलभाय।
सारा जग सखि मो कहँ शून्य लखाय।
कभू निकले पसीना कभू कँपकँपी आय।
मैंने बैठे ठाले लिय यह रोग लगाय।
मैंने लोगों से सुना है लागी बुरी है बलाय।
तू ने कहा था न लखियो दृग बलभाय।
चली घुँघटा में मैंने दोउ दृगन छुपाय।
मन नहिं माना कहा लखु दृग बलभाय।
कोई काला नाग तो नहीं है दृग बलभाय।
बुधि ने भी हाँ कही तो लखा घुँघटा उठाय।
लखतहिं वाने जाने कैसा जादू सा चलाय।
मैं तो लखतहिं रहि गई दृग बलभाय।
पुनि बार बार वार किये सैन बलभाय।
गिरी मुर्छित छिति कहि हाय बलभाय।
Source page 297
इन्द्रिय मन बुधि डूबे दृग बलभाय।
अब कहा करुँ कहाँ जावूँ विरह सताय।
सोउ बोल्यो नहिं मोय हौं हूँ बोली नहिं वाय।
अब कैसी करूँ कहाँ ढूँढूं वाय बलभाय।
मोय बड़ो रूप मद हतो तोर्यो बलभाय।
मेरा प्रान ले के ही रहेगा दृग बलभाय।
थे रसीले थे गँसीले थे नुकीले दृग वाय।
मोते सहा भी न जाय काऊ कहा भी न जाय।
सखि कह वाने मोहूँ यह रोग लगाय।
वे हैं स्वामिनि उनते न चहिय छुपाय।
दोउ गईं राधा रानी ढिंंग हाल सुनाय।
कहा तुम ही बताओ प्यारी कैसे रोग जाय।
बोली राधा रानी सखि याय राखु छुपाय।
यह रोग कोटि मुक्त महँ कोउ इक पाय।
तो पै कृपा भई पिय दिय रोग लगाय।
