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साधन एक भक्ति श्रुति गाय।
(नीको लागे...)
साधन एक भक्ति श्रुति गाय।
जाको लक्षण सुनु मन लाय।
भक्ति कामना हीन बताय।
द्वै कामना प्रमुख बतलाय।
एक कामना भुक्ति कहाय।
एक कामना मुक्ति बताय।
भुक्ति कामना मायिक आय।
मुक्ति कामना दिव्य बताय।
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ब्रह्मलोक लौँ जो सुख आय।
सो सबरोइ सुख भुक्ति कहाय।
यह सुख अल्प अनित्य बताय।
यह सब दुख परिणामी आय।
पुनि पुनि जन्म मरण करवाय।
लख चौरासी योनि घुमाय।
महामूढ़ येहि वेद बताय।
याते भुक्ति त्याज्य बतलाय।
मुक्ति भेद तो पाँच बताय।
एक मुक्ति सायुज्य कहाय।
यही मुक्ति कैवल्य कहाय।
कोउ मुक्ति एकत्व बताय।
यह ज्ञानिन की मुक्ति कहाय।
जीव ब्रह्म में घुल मिलि जाय।
प्रेमानंद बिन्दु नहिं पाय।
याते यह भी त्याज्य बताय।
भुक्तिहुँ ते यह निंद्य बताय।
चार मुक्ति भक्तन की आय।
एक मुक्ति तो सार्ष्टि कहाय।
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एक मुक्ति सालोक्य बताय।
एक मुक्ति सारूप्य कहाय।
एक मुक्ति सामीप्य कहाय।
चारहुँ प्रेम सुधा रस पाय।
किंतु सकाम भक्त कहलाय।
जो निष्काम भक्त कहलाय।
उन मन चारिहुँ मुक्ति न भाय।
शुद्ध भक्त तो वाय बताय।
जो पिय सुख ही चहत सदाय।
निज सुख गंध न सपनेहुँ आय।
भक्ति अनावृत रसिक बताय।
एक आवरण कर्म कहाय।
एक आवरण ज्ञान कहाय।
एक आवरण योग कहाय।
भक्ति सदा निरपेक्ष बताय।
भक्तिहिं चार भाव बतलाय।
एक भाव तो दास्य कहाय।
वाते श्रेष्ठ सख्य कहलाय।
सख्य श्रेष्ठ वात्सल्य बताय।
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सर्वश्रेष्ठ माधुर्य बताय।
यामें चारहुँ भाव समाय।
साधन नवधा भक्ति बताय।
स्मरण भक्ति तहँ प्रमुख बताय।
अन्य भक्ति सहयोगिनि आय।
साधन ही मन शुद्ध कराय।
गुरु की कृपा प्रेम तब पाय।
ह्लादिनि सार प्रेम कहलाय।
प्रेम जीवन का साध्य बताय।
प्रेम अधीन ब्रह्म बलभाय।
करहु “कृपालु” भक्ति मन लाय॥
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