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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 101 · 109/142

कीर्तन 101–134

कीर्तन 101 · Kirtan 101

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

39 source linesपुस्तक पृष्ठ 253–255PDF 270–272

तुम ही रहु ब्रज महँ इकली माय।

(नीको लागे...)

तुम ही रहु ब्रज महँ इकली माय।

हम सब कहुँ और जायँगी माय।

या ब्रज ते भल भरि पाई माय।

जितनोइ छोटो बलभाय माय।

Source page 254

तितनोइ खोटो यह मानु माय।

कर लँगर डगर महँ रार माय।

कभु सिर ते चुनरि उतार माय।

कभु गर लर मोतिन तोर माय।

कभु काँकरि गागरि फोर माय।

कभु सखन सँग मग रोके माय।

कभु कह हौं हौं ब्रजराज माय।

कभु माँगे दधि को दान माय।

ना दो तो छोरे मटुकि माय।

दधि खाय सखन सँग छकि के माय।

पुनि मटुकिहुँ फोरे निलज माय।

जो बरजहु तो औरहि इतराय।

कबहूँ अँगुठा दिखलाय माय।

कबहूँ निज जीभ दिखाय माय।

कबहूँ निज मुख मटकाय माय।

कबहूँ दृग बान चलाय माय।

कबहूँ लखि मृदु मुसकाय माय।

कबहूँ मुख मुरलि बजाय माय।

सूनो घर लखि घुसि जाय माय।

Source page 255

छींके लौं जो नहिं पहुँचि पाय।

लै सीढ़ी सखन बनाय माय।

जब इकलो ही यह आय माय।

तब हाल बड़ो ह्वै जाय माय।

सब सों कह हौं तव पिया माय।

तू भोरी कबहुँ न मान माय।

पकरन चह पकरि न पाय माय।

हरि छू मंतर ह्वै जाय माय।

जो कबहुँ पकरिहूँ पाय माय।

द्रुत मेरो पति बनि जाय माय।

जो कहूँ कंस पै जाउँ माय।

तो कह का कंस खसम तव आय।

अब लौं तो हम सब सही माय।

अब अति ह्वै गई हम जायँ माय।

ऊखल “कृपालु” याय बाँधु माय॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २109
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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