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ब्रज रस माधुरी

PART II · KIRTAN 32 · 40/142

कीर्तन 1–50

कीर्तन 32 · Kirtan 32

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

68 source linesपुस्तक पृष्ठ 85–89PDF 102–106

भज मन राधा रमन घनश्याम।

(नीको लागे...)

भज मन राधा रमन घनश्याम।

कर अरपन तन मन धन धाम।

Source page 86

जग का सुख अल्प सुख परिणाम।

जग सुख नश्वर दुख परिणाम।

इन्द्रिय विषय बढ़ावत काम।

ब्रह्महूँ ते बड़ इन्द्रिन काम।

सुरपतिहूँ चह विधि पद धाम।

घृत सम भोग अग्नि सम काम।

तजि दे इन्द्रिन पाँचन काम।

ब्रह्मलोक पर्यन्त सुख सब काम।

ब्रह्मलोक पर्यन्त मायिक धाम।

सुख अनंत शाश्वत घनश्याम।

क्षण क्षण वर्धमान सुख श्याम।

तू तो है जीव अंश घनश्याम।

तेरो सब कुछ अंशी घनश्याम।

चिदघन आनन्दघन घनश्याम।

बिनु श्रम मिलहिं तोहिँ घनश्याम।

ब्रह्म लोक ऊपर परव्योम धाम।

नित्य दिव्य सुख युत परव्योम धाम।

परव्योम धाम दिव्य चिन्मय धाम।

परव्योम ऊपर गोलोक धाम।

Source page 87

गोलोक मध्य शोभित ब्रजधाम।

ब्रज धाम ईश्वर हैं घनश्याम।

ब्रज धाम रस सम रस ब्रजधाम।

सर्वश्रेष्ठ माधुर्य रस ब्रज धाम।

श्याम सुख हित प्रेम प्रेम निष्काम।

निज इन्द्रिय सुख हित प्रेम काम।

निंदनीय जग का प्रेम निष्काम।

वंदनीय श्याम का प्रेम भी सकाम।

अति वंदनीय श्याम प्रेम निष्काम।

जीव का चरम लक्ष्य नहिं प्रेम श्याम।

जीव का लक्ष्य तो है सेवा श्याम।

प्रेम बिनु मिले नहिं सेवा श्याम।

गुरु की शरण गहहु वसुयाम।

गुरु द्वारा मिले प्रेम दिव्य निष्काम।

दिव्य मन को दे गुरु प्रेम निष्काम।

दिव्य मन हित करु नव भक्ति श्याम।

नव महँ प्रमुख स्मरण भक्ति श्याम।

वैधी अरु रागानुगा भक्ति श्याम।

शास्त्र विधि युक्त वैधी भक्ति घनश्याम।

Source page 88

बिनु शास्त्र विधि रागानुगा भक्ति श्याम।

रागानुगा प्रेमी पावे ब्रज रस श्याम।

वैधी भक्त पावे रस द्वारवती धाम।

माधुर्य भाव सर्वश्रेष्ठ भाव श्याम।

महाभाव प्रेम प्राप्त करे ब्रजबाम।

अनुराग प्रेम पावे द्वारवती बाम।

कुब्जा का प्रेम केवल है सकाम।

रति साधारणी कुब्जा बाम।

रुक्मिणि प्रेम निष्काम सकाम।

रति तो समंजसा रुक्मिणि बाम।

ब्रजगोपी प्रेम केवल निष्काम।

रति तो समर्था है ब्रजबाम।

निज सुख ही चह कुब्जा बाम।

निज सुख पिय सुख रुक्मिणि बाम।

पिय सुख ही चह सब ब्रजबाम।

विधि आदि चह पद रज ब्रजबाम।

ब्रजबाम प्रेम सम प्रेम ब्रजबाम।

ब्रजबाम प्रेम ऋणी माने आपु श्याम।

ऊधो आदि चह तनु लता ब्रजधाम।

Source page 89

सब ते बड़ा गोपी प्रेम निष्काम।

गोपी प्रेम आधीन ब्रह्म घनश्याम।

पाँचों मुक्ति हैं आधीन घनश्याम।

पाँचहुँ मुक्ति नहिं चह ब्रजबाम।

अष्टयामी सेवा चह ब्रजबाम।

ब्रजबाम प्रेम कठपुतली श्याम।

टुक छाछ दै नचावे ब्रजबाम श्याम।

हौं हूँ “कृपालु” चह प्रेम ब्रजबाम॥

ब्रज रस माधुरी · भाग २040
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 2. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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