Skip to main content

सखि कोउ देउ वैद बुलवाय।
(नीको लागे...)
सखि कोउ देउ वैद बुलवाय।
तन मन रोग लग्यो बहुताय।
पुनि पुनि उठति हूक हिय हाय।
हृदय गतिहुँ नित बाढ़ति जाय।
पुनि पुनि मम तनु काँपत जाय।
आवति दीरघ श्वास सदाय।
उर पीड़ा बाढ़ति ही जाय।
तनु ते निकसत स्वेद सदाय।
दिन नहिं चैन एक छिन आय।
तारे गिन गिन रैन बिताय।
Source page 312
दिन दिन यह तन छीजत जाय।
जग सुख सपनेहुँ नाहिँ सुहाय।
सुत पति संपति कोउ नहिं भाय।
जगत काज उलटो ह्वै जाय।
कोउ कह तोहिँ उन्माद जनाय।
कोउ कह भूत लग्यो तोहि आय।
कोउ कह तू तो गई बौराय।
जियत न मरत प्राण तनु भाय।
तलफत रहत सतत असहाय।
कैसे धर्म गृहस्थ निभाय।
कहा करुँ जावूँ कहँ हाय।
सखी बेगि उपचार बताय।
सखी जानि गई कौन बलाय।
यह तो प्रेम रोग सखि आय।
याको वैद्य सोइ बलभाय।
वाने ही यह रोग लगाय।
औषधि वैद दोउ इक आय।
यह तो रोग असाध्य बताय।
औषधि क्षणिक चैन दिलवाय।
Source page 313
वैद्य रोग को और बढ़ाय।
अच्छा लावूँ वैद बुलाय।
गई सखी द्रुत ढिंग बलभाय।
कही चलहु मो सँग बलभाय।
न तु सखि प्राण देह तजि जाय।
तुमने ही तो रोग लगाय।
श्याम वैद बनि सखि ढिंग आय।
सखि ने लखी दृगन बलभाय।
मृतक देह जनु प्रानहिं पाय।
नारी पकरि कहत बलभाय।
याको रोग कबहुँ नहिं जाय।
भाग्य भोग्य ज्ञानिहुँ कहँ आय।
कोटि मुक्त महँ कहुँ कोउ पाय।
यह ही प्रेम रोग कहलाय।
रोगी लखि “कृपालु” डरपाय॥
❦
Source, meanings & reading links