कीर्तन 101–134
कीर्तन 105 · Kirtan 105
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दे जा दे जा री सखी मोहिं दधि को दान।
दे जा दे जा री सखी मोहिं दधि को दान।
जो भी आवे येहि मग जावे दे के दान।
लागे नई आई ब्रज याते मोहिं न जान।
सूधे सूधे दे दे दान मेरो कहनो मान।
बिना दिये नहिं जाने पाये आगे जिय जान।
सखि कह तू न मोहिं कोउ ऐरी गैरी जान।
मैं हूँ श्यामा जू की सखियन परम प्रधान।
जाके कहूँ श्यामा जू को भूलि जाय लेना दान।
जा जा चला जा चला जा सूधो कहनो मान।
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मटुकिहुँ ते तू हाथ धोयेगी सच मान।
सखि कह लो मैं हारी तू ही जीता हठी कान्ह।
अच्छा जा जा ले आ लता पत्र दउँ दधि दान।
उत लेने गये लता पत्र कुंज बिच कान्ह।
इत सखि छुपि गई द्रुत कुंज लतान।
लता पत्र ले के आये नहिं पाये सखि कान्ह।
चहुँ दिशि ताके खरे खरे कान्ह खिसियान।
इतने में आईं तहँ श्यामा सँग सखियान।
लखि सखियन श्यामा सँग भाजि गये कान्ह।
वाने श्यामा को बतायो कारी करतूति कान्ह।
श्यामा जू ने कहा सब छुपो कुंज लतान।
एक सखि खरी रहु आवे पुनि सोइ कान्ह।
राधे राधे कहि दीजो जब आवे सोइ कान्ह।
तब सब इक सँग पकरहु तेहि कान्ह।
पुनि सब चुनरिन तरु बाँधु कान्ह।
जब सोउ माँगे मोहिं देउ मुक्ति दान।
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पुनि कहु उठो बैठो सात बार तुम कान्ह।
जब सब कर ले तो टेरो मोहिं सखियान।
सबने ही किया ऐसे बाँधे तरु महँ कान्ह।
कान्ह ने भी किया वैसे जैसे कह सखियान।
तब आईं स्वामिनि जू हूँ ढिंग कान्ह।
अब करहु कृपा दे दो मुक्ति कह कान्ह।
