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अद्वितीय इक तत्व कहाय।
(नीको लागे...)
अद्वितीय इक तत्व कहाय।
ब्रह्म नाम जेहि वेद बताय।
ब्रह्म रूप भी तीन बताय।
एक रूप तो ब्रह्म कहाय।
एक रूप परमात्मा आय।
एक रूप भगवान कहाय।
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तीनिहुँ रूप अभिन्न बताय।
निराकार तो ब्रह्म कहाय।
ब्रह्म शक्ति अव्यक्त बताय।
परमात्मा साकार बताय।
वामें शक्ति कछुक प्रकटाय।
जो स्वरूप भगवान कहाय।
वामें सर्वशक्ति प्रकटाय।
सोइ साकार ब्रह्म बलभाय।
कृष्ण शक्ति अगनित श्रुति गाय।
वामें तीन प्रमुख बतलाय।
एक परा इक जीव कहाय।
एक शक्ति माया कहलाय।
तीनिहुँ शक्ति नित्य कहलाय।
परा स्वरूप शक्ति कहलाय।
अंतरंग परा कहलाय।
जीव शक्ति तटस्थ कहाय।
माया बहिरंगा कहलाय।
वाके भेदहुँ तीन बताय।
कृष्ण सच्चिदानंद कहाय।
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सत की शक्ति संधिनी आय।
संवित चित की शक्ति कहाय।
आनँद शक्ति ह्लादिनी आय।
सर्वश्रेष्ठ ह्लादिनि बतलाय।
याते ब्रह्म सदा सुख पाय।
ह्लादिनि सार प्रेम कहलाय।
जीव साध्य यह प्रेम बताय।
प्रेम प्राप्ति क्रम सुनु मन लाय।
सर्वप्रथम श्रद्धा उर लाय।
पुनि प्रेमी गुरु के ढिंग जाय।
मन बुधि गुरु के शरण कराय।
पुनि मन ते सत्संग कराय।
पुनि मन ते हरि भजन कराय।
पुनि अनर्थ मन ते मिटि जाय।
पुनि हो उर निष्ठा बलभाय।
पुनि उपजे उर रुचि बलभाय।
पुनि हो सक्त चित्त बलभाय।
पुनि हो भाव भक्ति बलभाय।
अंतिम दिव्य प्रेम बलभाय।
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गुरु की कृपा प्रेम तब पाय।
प्रेम वश्य रह नित बलभाय।
प्रेमी पाछे चल बलभाय।
कारण प्रेमी पद रज पाय।
सर्वश्रेष्ठ रस प्रेम कहाय।
कोटिन मुक्तन महँ कोउ पाय।
उपर्युक्त जो क्रम बतलाय।
वाते साध्य प्रेम मिलि जाय।
साधन ही दे साध्य दिलाय।
साधन ते मन शुद्ध कराय।
गुरु की कृपा प्रेम तब पाय।
जाके उर श्रद्धा नहिं आय।
सोउ सत्संग करे मन लाय।
सत्संगहिँ श्रद्धा उपजाय।
यदि सत्संगहुँ नहिं कोउ पाय।
रोकर विनय करे बलभाय।
तब “कृपालु” हरि संत मिलाय॥
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