कीर्तन 101–134
कीर्तन 124 · Kirtan 124
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सखि नटखट नंदकुमार, हैं जादूगर सरदार।
सखि नटखट नंदकुमार, हैं जादूगर सरदार।
मो पै अस जादू डार, मैं भूलि गई घर बार॥
मैं लखि रहि यमुना धार, आये तहँ सोइ ठगहार।
औचक ह्वै गये दृग चार, किय वाने सैनन वार॥
सो सैन भई उर पार, हौं तन मन सब गइ हार।
पुनि आयो ढिंग रिझवार, कह हौं ही साँचो यार॥
पुनि घूँघट दियो उघार, भेंट्यो बरबस रिझवार।
हौं सुधि बुधि देह बिसार, मुर्छित गिरि धरणि मझार॥
मोहिं मुर्छित लखि बटमार, लिय तान मुरलि रिझवार।
सुनि तान समाधि बिसार, उठि बैठी चितवति यार॥
पुनि सो लबरन सरदार, किय नैनन सैनन वार।
पुनि कह तू करि ले प्यार, यह जीवन है दिन चार॥
हौं हाँ या ना न उचार, पुनि लखन लगी जल धार।
मन कह पुनि वाय निहार, तजु लोक लाज ब्रजनार॥
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अब खारो लग संसार, जित देखूँ दीखत यार।
उर मधुर वेदना धार, नस नस बस रस रिझवार॥
