कीर्तन 51–100
कीर्तन 98 · Kirtan 98
Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ठाकुर ठकुरानी, प्रेम रूप रस खानी।
(कहुँ देखे आली, ललित त्रिभंगी लाल . . .)
Source page 158
मेरी राधेरानी सम मेरी राधेरानी,
जाके पाछे पाछे डोलें सारँगपानी।
जाकी हैं दिवानी बानी कमला भवानी,
पाछे चलि हरि बोलें जय हो महरानी।
जय हो जय हो ठाकुर, जय हो ठकुरानी।
प्रणत पै होड़ करें कौन बड़दानी।
मैंने तो “कृपालु” दोनों एकहिं मानी।।
मेरी राधेरानी वृंदावन ठकुरानी।
मेरी राधेरानी प्रेम रूप रस खानी।
Source page 159
मैं तो वारी जाऊँ कुंज बिहारी पै।
मैं तो वारी जाऊँ बरसाने वारी पै।
मैं तो वारी जाऊँ वारी बनवारी पै।
मैं तो वारी जाऊँ भोरी भारी प्यारी पै।
मैं तो वारी जाऊँ रास बिहारी पै।
मैं तो वारी जाऊँ ब्रज रस वारी पै।
मैं तो वारी जाऊँ मदन मुरारी पै।
मैं तो वारी जाऊँ भानुदुलारी पै।
