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ब्रज रस माधुरी

PART IV · KIRTAN 2 · 5/20

कीर्तन 1–16

कीर्तन 2 · Kirtan 2

Kirtan by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

14 source linesपुस्तक पृष्ठ 6PDF 7

सुमिरन कर ले मना, राधा अरु राधारमना।

(सुमिरन कर ले मना . . .)

सुमिरन कर ले मना, राधा अरु राधारमना।

दोई गोपीजन जीवना, राधा अरु राधारमना।

तीनों मम प्राणधना, गोपी राधा राधारमना।

ह्वै निष्काम मना, नित इनहिंन भजना।

गोपी भाव गुरु ही मना, शरण ग्रहण करना।

राग द्वेष जग में मना, पलहूँ न कभु करना।

साँचो मीत तेरे दो मना, राधा अरु राधारमना।

साँचो माता पिता हैं मना, राधा अरु राधारमना।

तेरे सब कुछ हैं मना, राधा अरु राधारमना।

भाव मधुर ही मना, राधा रमना में रखना।

बनि के अनन्य मना, राधारमना को भजना।

भुक्ति मुक्ति दोनों को मना, डाकिनी समान मानना।

दोनों ही ‘कृपालु’ हैं मना, राधा अरु राधारमना।

ब्रज रस माधुरी · भाग ४005
Source, meanings & reading links

Source book: Braj Ras Madhuri Part 4. जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज · राधा गोविंद समिति This is an unofficial, personal, partial collection.

English meaning: unavailable. A separate Hindi meaning is unavailable in this supplied source.

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