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पुस्तक परिचय · About the book
प्रकाशकीय (उपलब्ध अंश)
के विशेषरूपेण पतित जीवों के हृदय में इन बातों को
उतारना, और वह भी ऐसे समय में जब अपनी स्वार्थ-
सिद्धि के लिये अहंकार युक्त इस जीव की झूठी प्रशंसा
करके उसके अहंकार को और अधिक वर्धित करने
वाले एवं सांसारिक कामनाओं की सिद्धि के लिये ही
ईश्वर-भक्ति का उपदेश देने वाले लोकरंजक उपदेशक
ही चारों ओर विद्यमान हों, अत्यन्त ही दुरूह कार्य
है। किन्तु जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की भक्ति
रचनाओं की यह अभूतपूर्व विशेषता है कि वे इस
असम्भव से कार्य को भी सहज ही सम्भव कर देती
हैं। संकीर्तनों में व्यक्त भाव इतने मार्मिक व हृदय को
आलोडित करने वाले हैं कि दीनता एवं निष्कामता के
भाव सहज ही साधक के हृदय में अपनी जड़ें जमाने
लगते हैं, जिससे वह बिना किसी विशेष प्रयास के ही
विशुद्धा भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता जाता है। भक्ति-
पथ के पथिक प्रत्येक साधक को ‘ब्रजरस माधुरी’ के
सहज माधुर्य का पान करके अपनी देवदुर्लभ मानव
