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हरि-गुरु से ही प्रेम
Hari-Guru se hi prem
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New Launch 🎵 लापरवाही की नींद से जगाने वाले पद #BhaktiChallenge 75 #PremRasMadira
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तू मन! मनमानी त्याग रे।
बीते जनम अनंत नींद महँ, अब झटपट उठ जाग रे।
पुत्र कलत्र मित्र आदिक जे, तिन करु द्वेष न राग रे।
नँदनंदन पादारविंद ते, करि ले अब अनुराग रे।
तजि दे इंद्रिन विषय वासना, प्रेम सरस रस पाग रे।
जो 'कृपालु' चह भुक्ति मुक्ति तो, लगे प्रेम पट दाग रे॥
कहुँ देखे आली, ललित त्रिभंगी लाल।
जेहि सिर सोहति मोर चंद्रिका, लोचन कमल विशाल।
भृकुटी कुटिल कनक श्रुति कुंडल, मृगमद तिलक सुभाल।
उर फहरत पट पीत मनोहर, गल विलसत वनमाल।
युगल पाणि मणिमय कंकण कटि, किंकिणि शब्द रसाल।
झूमत चलत बजत पग पायल, लजवत राज मराल।
मृदु मुसकाय बजाय मुरलि-धुनि, मोहत सब ब्रजबाल।
सो 'कृपालु' मम जीवनधन पिय, नँदनंदन गोपाल॥
Original announcement
Hindi 1 · English 1Dates on the poster: –


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