सिद्धान्त-माधुरी · पद 55
तू मन! मनमानी त्याग रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tū mana! manamānī tyāga re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तू मन! मनमानी त्याग रे।
2बीते जनम अनंत नींद महँ, अब झटपट उठ जाग रे।
3पुत्र कलत्र मित्र आदिक जे, तिन करु द्वेष न राग रे।
4नँदनंदन पादारविंद ते, करि ले अब अनुराग रे।
5तजि दे इंद्रिन विषय वासना, प्रेम सरस रस पाग रे।
6जो “कृपालु” चह भुक्ति मुक्ति तो, लगे प्रेम पट दाग रे॥
हिन्दी भावार्थ
हे मन! अब तू अपनी मनमानी छोड़ दे। तुझे अज्ञान को नींद में सोते हुए अनन्त जन्म हो गये। अब जागकर तुरन्त उठ बैठ। पुत्र, स्त्री, मित्र आदि से न तो शुत्रता कर, न तो मित्रता ही कर। श्यामसुन्दर के युगल चरणों में निरन्तर प्रेम कर। इन्द्रियों की विषय वासनाओं को छोड़ दे एवं सरस प्रेम रस में अनुरक्त हो जा। 'कृपालु' कहते हैं, किन्तु ध्यान रहे कि भुक्ति एवं मुक्ति की कामना न उत्पन्न होने पाये, अन्यथा प्रेम के उज्ज्वल वस्त्र पर कलंक लग जायगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 103