सिद्धान्त-माधुरी · पद 54
तुमहिं तजि नहिं चहिये गोलोक।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tumahiṁ taji, nahiṁ chahiye goloka
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तुमहिं तजि नहिं चहिये गोलोक।
2अस ससुरारि पियारि लगति केहि, पिय न होय जेहि ओक।
3अस न चहौं तव मधुर मिलन रस, जहँ न विरह-रस शोक।
4तजि रस द्वैत न चह सुख निर्गुण, रस अद्वैत अशोक।
5तजि तव रूपहिं नहिं चह भूलेहुँ, ब्रह्मानंदालोक।
6अस “कृपालु” रस को चह पुनि जहँ, विधि निषेध को रोक॥
हिन्दी भावार्थ
एक तत्त्वज्ञ रसिक कहता है-हे श्यामसुन्दर। तुमको छोड़ कर मैं तुम्हारा गोलोक भी नहीं चाहता। संसार में किसी भी प्रेयसी को ऐसी ससुराल प्यारी नहीं लगती, जिस ससुराल के घर में उसका प्रियतम न हो। मैं ऐसा नित्य-मधुर-मिलन का भी रस नहीं चाहता जिसमें विरह-रस का मिश्रण न हो। मैं सेवक-सेव्य- भावयुक्त द्वैत प्रेम-रस से रहित एकत्व ब्रह्मानन्द रस को भी नहीं चाहता। मैं तुम्हारी रूप-माधुरी को छोड़कर तुम्हारे प्रकाश-मात्र के ब्रह्मानन्द को भी नहीं चाहता। 'कृपालु के शब्दों में पुनः ऐसे रस को कैसे चाहूँगा, जो स्वर्गादि लोक सम्बन्धी है, जहाँ विधि निषेध की भयंकर व्याधि है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 102-103