सिद्धान्त-माधुरी · पद 53
तन यौवन धन दिन चार रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tana yauvana dhana dina chāra re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तन यौवन धन दिन चार रे।
2बड़े बड़े सुंदर तनु वारे, अंत भये जरि छार रे।
3बड़े बड़े यौवन मद वारे, अंत खाँय लठ मार रे।
4बड़े बड़े अगनित धन वारे, अंत चलत सब झार रे।
5बड़े बड़े जे रहे कहावत, नाम न तिन संसार रे।
6ताते अब “कृपालु” बनि छोटे, भजु नित नंदकुमार रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! यह शरीर, यह युवावस्था एवं यह धन चार दिन ही रहेगा, इसका अहंकार छोड़ दे। बड़े-बड़े सुन्दर शरीर वाले अन्त में जल कर राख हो गये, बड़े-बड़े जवानी के अभिमान में चूर अपने ही प्रियजनों के हाथ लट्ठ की मार खाये। बड़े-बड़े करोड़पति अन्त में हाथ पसार कर चले गये। इतिहास में जो बड़े-बड़े कहलाते थे उनका संसार से नामनिशान भी मिट गया। 'कृपालु' कहते हैं इसलिए अब छोटे बनकर अर्थात् दीन बनकर श्यामसुन्दर का निरन्तर भजन कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 102