सिद्धान्त-माधुरी · पद 52
तजो रे मन! छनभंगुर वैराग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tajo re mana! chhana-bhaṅgura bairāga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तजो रे मन! छनभंगुर वैराग।
2करि विश्वास शरण गहु संतन, मोह तिमिर तव भाग।
3करत करत सत्संग सतत तब, हरि चररन मन लाग।
4मधुर मिलन लगि विकल रैन दिन, तपत चित्त विरहाग।
5तब निर्मल मन संत कृपा ते, पाव सहज अनुराग।
6हो “कृपालु” मन सहज विरागी, सहज प्रेम रस पाग॥
हिन्दी भावार्थ
हे मन! बिना तत्त्व को समझे क्षणभंगुर वैराग्य में मत पड़ो। सर्वप्रथम पूर्ण विश्वासपूर्वक वास्तविक महापुरुषों की शरण जाओ, तभी तुम्हारा अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट होगा। इस प्रकार तैलधारावत् निरन्तर महापुरुषों का संग एवं उनके आदेश पालन करते-करते ही श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में लगाव होगा। तत्पश्चात् उनके मधुर-मिलन के लिए प्रतिक्षण परम व्याकुलतावश तुम पूर्व मिलन की विरहाग्नि में जलोगे। इस प्रकार विरहाग्नि में निरन्तर जले हुए मन! तुम निर्मल बनकर महापुरुषों की कृपा से स्वाभाविक, विशुद्ध निष्काम प्रेम प्राप्त कर सकोगे। 'कृपालु' कहते हैं कि हे मन! तू स्वाभाविक, संत कृपा द्वारा प्राप्त, प्रेम के द्वारा ही अन्य समस्त सांसारिक विषयों का स्वाभाविक रूप से विरागी बन सकेगा। तात्पर्य यह है कि सांसारिक दुःखों से घबड़ाकर बिना समझे बूझे एवं बिना महापुरुषों के अवलम्ब के अगर तू किसी व्यक्ति को धर्मभ्रष्ट करते हुए बाबाजी बना देगा तो उसका परिणाम अत्यंत भयानक हो सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 101