सिद्धान्त-माधुरी · पद 51
तजो रे मन! उन संतन को संग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tajo re mana! una santana ko saṅga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तजो रे मन! उन संतन को संग।
2जिनको लक्ष्य लोकरंजन को, रँगि रँग रंग बिरंग।
3बात बघारत ब्रजरसिकन की, पिये विषय रस भंग।
4शिष्यन कान फूँकि बनि स्वामी, ठगत ठगिन के ढंग।
5हरिजन बनि हरिजनहुँ न मानत, चढ़ि अभिमान तुरंग।
6वरु “कृपालु” वनचर बनि रहियो, लखु जनि दंभिन अंग॥
हिन्दी भावार्थ
रे मन! उन संतों का बाना बनाये हुए पाखंडियों का संग छोड़ दे, जिनका लक्ष्य रँग-बिरंगे रँगों से कपड़े रंग कर संसार को खुश करना मात्र है। वे दम्भी, बातें तो ब्रज महारसिकों की तरह बघारते हैं, पर स्वयं सांसारिक विषयरस की भाँग पिये हुए उसी में मतवाले रहते हैं। सांसारिक स्वार्थ सिद्धि के लिए अनधिकारी अनन्त जीवों के कान फूँककर दीक्षा का ढोंग रचते हुए उनको शिष्य बनाते हैं, तथा स्वयं स्वामी बनकर पक्के मायावी ठगों की भाँति उन शिष्यों को ठगते हैं। वे दम्भी अपने आपको संत कहते हैं। किन्तु वास्तविक संतों की, अभिमान के घोड़े पर चढ़े हुए होने के कारण, निंदा करते हैं, क्योंकि वे अपने धन, मान, आदि में उन वास्तविक संतों के द्वारा न्यूनता पाते हैं। कृपालु' कहते हैं कि तुम भले ही जंगल के भीलों की तरह वन के वनचर रहो, किन्तु उन दम्भी संतों का मुख तक न देखो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 100