# तजो रे मन! उन संतन को संग।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0060-M03-K051
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 51
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 30–30

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>तजो रे मन! उन संतन को संग।  
<a id="line-2"></a>जिनको लक्ष्य लोकरंजन को, रँगि रँग रंग बिरंग।  
<a id="line-3"></a>बात बघारत ब्रजरसिकन की, पिये विषय रस भंग।  
<a id="line-4"></a>शिष्यन कान फूँकि बनि स्वामी, ठगत ठगिन के ढंग।  
<a id="line-5"></a>हरिजन बनि हरिजनहुँ न मानत, चढ़ि अभिमान तुरंग।  
<a id="line-6"></a>वरु “कृपालु” वनचर बनि रहियो, लखु जनि दंभिन अंग॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

रे मन! उन संतों का बाना बनाये हुए पाखंडियों का संग छोड़ दे, जिनका लक्ष्य रँग-बिरंगे रँगों से कपड़े रंग कर संसार को खुश करना मात्र है। वे दम्भी, बातें तो ब्रज महारसिकों की तरह बघारते हैं, पर स्वयं सांसारिक विषयरस की भाँग पिये हुए उसी में मतवाले रहते हैं। सांसारिक स्वार्थ सिद्धि के लिए अनधिकारी अनन्त जीवों के कान फूँककर दीक्षा का ढोंग रचते हुए उनको शिष्य बनाते हैं, तथा स्वयं स्वामी बनकर पक्के मायावी ठगों की भाँति उन शिष्यों को ठगते हैं। वे दम्भी अपने आपको संत कहते हैं। किन्तु वास्तविक संतों की, अभिमान के घोड़े पर चढ़े हुए होने के कारण, निंदा करते हैं, क्योंकि वे अपने धन, मान, आदि में उन वास्तविक संतों के द्वारा न्यूनता पाते हैं। कृपालु' कहते हैं कि तुम भले ही जंगल के भीलों की तरह वन के वनचर रहो, किन्तु उन दम्भी संतों का मुख तक न देखो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 100

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
