सिद्धान्त-माधुरी · पद 50
जौहरी बन्यो सकल संसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jauharī banyo sakala sansāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जौहरी बन्यो सकल संसार।
2"हीरा एक संत"तेहि परखत, सबै बुद्धि अनुसार।
3ज्यौं लै लवण डली सिर हिमगिरि, पैरि सिंधु चह पार।
4त्योँ बुधि अगम संत गति खोजत, जग जड़ जीव गमार।
5करत नाम अपराध क्षमत नहिं, किये कोटि उपचार।
6जो बुधि-बल कह"संतहिं चीन्ह्यों", ध्रुव विनाश व्रतधार।
7सुनु “कृपालु” बिनु कृपा संतजन, कोउ न जाननहार॥
हिन्दी भावार्थ
महापुरुष रूपी हीरे को अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार परखने में सारा संसार अपने-आपको जौहरी समझता है। जिस प्रकार एक नमक की टुकड़ी अपने सिर पर हिमालय पहाड़ को रखकर अपार समुद्र को तैरकर पार करना चाहती है, उसी प्रकार महान् से महान् बुद्धि से अगम्य महापुरुषों के अंतरङ्ग को सांसारिक मूर्ख जड़ जीव जानने का दावा करता है। इसका परिणाम यह होता है कि जीव, महापुरुषों को न समझ सकने के कारण सन्त-निंदा रूपी नामापराध करता है जिसका निवारण करोड़ों उपायों से भी नहीं हो सकता। यदि कोई जीव अपनी मायिक बुद्धि के बल से महापुरुषों को पहिचानने का दावा करे तो समझ लेना चाहिये कि उसका सर्वनाश अवश्यंभावी है। 'कृपालु' कहते हैं कि बिना महापुरुषों को कृपा के उन्हें कोई भी जीव अपनी सीमित बुद्धि के बल पर नहीं समझ सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 99-100