# जौहरी बन्यो सकल संसार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0059-M03-K050
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 50
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 30–30

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>जौहरी बन्यो सकल संसार।  
<a id="line-2"></a>"हीरा एक संत"तेहि परखत, सबै बुद्धि अनुसार।  
<a id="line-3"></a>ज्यौं लै लवण डली सिर हिमगिरि, पैरि सिंधु चह पार।  
<a id="line-4"></a>त्योँ बुधि अगम संत गति खोजत, जग जड़ जीव गमार।  
<a id="line-5"></a>करत नाम अपराध क्षमत नहिं, किये कोटि उपचार।  
<a id="line-6"></a>जो बुधि-बल कह"संतहिं चीन्ह्यों", ध्रुव विनाश व्रतधार।  
<a id="line-7"></a>सुनु “कृपालु” बिनु कृपा संतजन, कोउ न जाननहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

महापुरुष रूपी हीरे को अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार परखने में सारा संसार अपने-आपको जौहरी समझता है। जिस प्रकार एक नमक की टुकड़ी अपने सिर पर हिमालय पहाड़ को रखकर अपार समुद्र को तैरकर पार करना चाहती है, उसी प्रकार महान् से महान् बुद्धि से अगम्य महापुरुषों के अंतरङ्ग को सांसारिक मूर्ख जड़ जीव जानने का दावा करता है। इसका परिणाम यह होता है कि जीव, महापुरुषों को न समझ सकने के कारण सन्त-निंदा रूपी नामापराध करता है जिसका निवारण करोड़ों उपायों से भी नहीं हो सकता। यदि कोई जीव अपनी मायिक बुद्धि के बल से महापुरुषों को पहिचानने का दावा करे तो समझ लेना चाहिये कि उसका सर्वनाश अवश्यंभावी है। 'कृपालु' कहते हैं कि बिना महापुरुषों को कृपा के उन्हें कोई भी जीव अपनी सीमित बुद्धि के बल पर नहीं समझ सकता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 99-100

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
