सिद्धान्त-माधुरी · पद 49
जीव जड़ दे जड़ता अब छोड़।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jīva jad̤a, de jad̤atā aba chhod̤a
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जीव जड़ दे जड़ता अब छोड़।
2तू कह मन विषयन ही धावत, लै इन इंद्रिन घोड़।
3तू बुधि-सारथि-बल मन-रजु गहि, दे इन्द्रिन मुख मोड़।
4बुधि मलीन माया अधीन जो, तेहि संतन बुधि जोड़।
5पुनि रथ लै चलु प्रेम नगर कहँ, जग नाते सब तोड़।
6तहँ “कृपालु” मिलिहँहिं मनमोहन, जीत जीत द्रुत होड़॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मूर्ख जीव! अब मूर्खता छोड़ दे। तू कहता है मैं क्या करूँ, मेरा मन नहीं सुनता। वह इन्द्रिय रूपी घोड़ों को लेकर प्राकृत विषय की ओर ही भागता है। किन्तु मैं कहता हूँ कि जिस प्रकार इन्द्रियों पर मन का नित्य अधिकार है, उसी प्रकार मन पर भी तो बुद्धि का नित्य अधिकार है। अतएव तू बूद्धि-रूपी सारथी के द्वारा मन-रूपी रस्सी को पकड़ क़र इन्द्रियों रूपी घोड़ों को ईश्वर की ओर मोड़ दे। यदि तू यह कहे कि बुद्धि भी तो मायाधीन होने के कारण नासमझ है, तो उसका उपाय सुन। तू अपनी बुद्धि को महापुरुषों की बुद्धि में जोड़ दे, फिर उस बुद्धि के द्वारा मन पर शासन कर। इस प्रकार शरीरेन्द्रिय-मन-बुद्धि-जीवात्मा सब प्रेम-नगर पहुँच जायेंगे। शर्त यह है कि यह सब करने के पहिले संसार की क्षणभंगुरता पर बार-बार विचार करके मन को उदासीन बना ले। कृपालु कहते हैं इस प्रकार प्रेमनगर में परम प्रेमास्पद श्यामसुन्दर का नित्य मिलन होगा और तू सदा के लिए कृतार्थ हो जायेगा। दौड़ को शीघ्रातिशीघ्र जीत ले।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 98-99