सिद्धान्त-माधुरी · पद 48
जाउँ ब्रजनारिन की बलिहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jāuṁ brajanārina kī balihāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जाउँ ब्रजनारिन की बलिहार।
2जिन ब्रजनारिन की तारिन पै, निरतत नंदकुमार।
3जिन घर"दारी के", गारी के, सुनन हेतु पगधार।
4जिन माखन चाखन हित पावत, नित उपाधि"ठगहार"।
5जिनकी हा हा खात, जात डरि, मानिनि मान निहार।
6जिनकी करत “कृपालु” चाकरी, सगुण ब्रह्म साकार॥
हिन्दी भावार्थ
हम उन ब्रजांगनाओं पर बलिहार जाते हैं जिनकी ताली पर श्यामसुन्दर नृत्य करते हैं। जिनके घरों में "दारी के इस गाली को सुनने के लिये स्वयं जाते हैं। जिनके मक्खन के खाने में उन्हें ठगहार की उपाधि मिलती है। मानिनी किशोरी जी को मजाने के लिये जो हा हा खाते हैं एवं डरते हुए उसके पास जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जिनकी दासता स्वयं भगवान् करते हैं, मैं उन ब्रजांगनाओं पर बलिहार जाता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 97-98