सिद्धान्त-माधुरी · पद 47
जगत की बड़ी अनोखी बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jagata kī bad̤ī anokhī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जगत की बड़ी अनोखी बात।
2यदपि अनुभवत सतत दुसह दुख, तदपि न मूढ़ अघात।
3संतन चरण शरण नहिं आवत, भावत कुलटन लात।
4सुत, वित, नारि वियोग पाइ कह, मिथ्या जगत लखात।
5पुनि ज्यों ही ये मिले सत्य लखि, लंपट बनि लपटात।
6इक पण कारण करत तासु रण, जासु प्राण-प्रिय नात।
7अगम “कृपालु” यथा हरिलीला, त्यों मोहिं जगत जनात॥
हिन्दी भावार्थ
सांसारिक मनुष्यों की बड़ी ही विचित्र बात है। सांसारिक समस्त विषय-वासनाओं में लोग निरन्तर घोर दुःख का अनुभव करते हैं, फिर भी अज्ञानतावश उनका पेट नहीं भरता। महापुरुषों के चरण-कमलों की शरण में नहीं आते किंतु उन्हें कुलटा स्त्रियों के चरणों में पड़े रहने में थोड़ी भी लज्जा नहीं आती। पुत्र, स्त्री, धन आदि का जब किसी भी कारणवश वियोग या अभाव हो जाता है तब सभी सांसारिक जीव कहने लगते हैं कि संसार मिथ्या है। किंतु यह स्मरण रखना चाहिये कि यह वैराग्य सांसारिक विषयों से नहीं है वरन् सांसारिक विषयों के अभाव से है। क्योंकि ऐसे विरक्तों को जैसे ही पुत्र, स्त्री, धन आदि की प्राप्ति हो जाती है, वैसे ही वह उन विषयों में पुनः पूर्ण आसक्त हो जाता है। प्रायः महापुरुषों के सँग न होने से ही यह सब दुष्परिणाम हैं। यह संसारी एक पैसे के लिए भी स्वार्थ परायणतावश उससे झगड़ा कर बैठता है जिसको वह इसके पूर्व प्राणाधिक प्रिय कहा करता था। कृपालु' कहते हैं कि मुझे तो जितनी विचित्र एवं बुद्धि से परे भगवान् की लीलाएँ प्रतीत होती हैं, उतनी ही विचित्र उपर्युक्त सांसारिक जीवों की भी प्रतीत होती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 96-97