सिद्धान्त-माधुरी · पद 46
जग गोरखधंधा जान रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jaga gorakhadhandhā jāna re!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जग गोरखधंधा जान रे।
2सुत, वित, नारि ईषणा तीनी, तू इन माँहिं भुलान रे।
3नर पामर की कौन बात जब, विधि हरि हर उनमान रे।
4हार मानि बलवान काल ते, छिन महँ करत पयान रे।
5स्वारथ के सब मीत जान मन, मात पिता बनितान रे।
6साँचो मीत “कृपालु” मान इक, सुंदर श्याम सुजान रे॥
हिन्दी भावार्थ
के सब मीत जान मन, मात पिता बनितान रे। अरे मन! यह संसार गोरखधंधे के समान ही निरर्थक है। धन, पुत्र, स्त्री इन तीन इच्छाओं में तू भूला हुआ है। अरे मूर्ख मन! बेचारे मनुष्यों की तो बात ही क्या है, ब्रह्मा, विष्णु शंकर सरीखे ब्रह्माण्ड नायकों को भी बलवान काल से हार मानकर एक क्षण में इस संसार से जाना पड़ता है। अरे मन! माता, पिता, स्त्री आदि सब स्वार्थ सिद्धि के हेतु ही मित्र बने हुए हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि वास्तविक मित्र तो एकमात्र श्यामसुन्दर ही हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 96