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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 45

छाँड़ु मन! जग मृगजल की आस।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhāṁd̤u mana! jaga mṛigajala kī āsa

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1छाँड़ु मन! जग मृगजल की आस।

2मृगजल पियत अमित युग बीते, तऊ बुझी नहिं प्यास।

3संतन चरण शरण नहिं आयो, जहँ सुरसरि को वास।

4इंद्रिन विष्ठा-विषय नरक महँ, कियो वास बनि दास।

5दीनभाव निष्काम श्याम भजु, करु सद्गुरु विश्वास।

6तेहि बिनु मन! “कृपालु” गहि बूँदन, चाहत चढ़न अकास॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! सांसारिक विषय रस-रूपी मृग-जल को पीते हुए तुझे अनन्त युग बीत गये फिर भी तेरी प्यास बुझ नहीं सकी, अतएव अब इस सांसारिक विषय रस रूपी मृग-जल की आशा छोड़ दे। अरे मन! इन्द्रियों के पाँचों विषय रूपी विष्ठा के नरक में तूने अनादि काल से आज तक निरंतर निवास किया किंतु जहाँ साक्षात् भगवती भागीरथी गङ्गा बहती रहती है, उन महापुरुषों के चरणों को शरण नहीं गया। सद्गुरु पर पूर्ण विश्वास रखते हुए निष्काम भाव से दीनतापूर्वक निरन्तर श्यामसुन्दर का भजन कर। 'कृपालु' कहते हैं कि उपरोक्त बातों को न मानकर यदि तू अपनी प्यास और प्रकार से बुझाना चाहता है तो तू वैसा ही मूर्ख है जैसे कोई बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़कर आकाश को चढ़ना चाहे जो तीनों काल में असम्भव है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 95