सिद्धान्त-माधुरी · पद 44
छाँड़ु मन! सनक तनक सुनु बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhāṁd̤u mana! sanaka tanaka sunu bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छाँड़ु मन! सनक तनक सुनु बात।
2छिन सुख पाव पाव छिन दुख पुनि, जोरि जगत सोँ नात।
3इक वस्तुहिं इक सुखी, दुखी इक, एक उदास लखात।
4पुनि कहु वा वस्तुहिं सुख या दुख, या नहिं दोउ जनात।
5जो जेहि वस्तु मानि सुख जितनो, सोचत रह दिनरात।
6सो तेहि वस्तु पाव सुख तितनो, वस्तुहिं सुख पतियात।
7पुनि तेहि विरह पाव दुख तितनोइ, निज भ्रमवश पछितात।
8कह “कृपालु” जग ते उदास रहु, गहहु शरण बलभ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! दुराग्रह छोड़ दे! जरा मेरी बात पर विचार तो कर। तू संसार से प्यार करके एक क्षण में तो सुखी हो जाता है एवं दूसरे ही क्षण दुःखी हो जाता है। जरा सोच तो, एक ही वस्तु से एक व्यक्ति सुखी होता है तो दूसरा दुःखी होता है एवं एक व्यक्ति उदासीन दिखाई देता है। अब तू ही बता उस वस्तु में सुख है या दुःख या दोनों ही नहीं हैं? अरे मन! जो जिस वस्तु में जितने सुख का बार-बार चिंतन करता है उसको उस वस्तु से अपना ही माना हुआ उतना सुख मिल जाता है और वह यह समझ बैठता है कि उसे उस वस्तु से ही वह सुख मिल रहा है। फिर जिस वस्तु से जिसको जितना सुख मिलता है उस वस्तु के वियोग में उसको उतना दुःख भी मिलता है। 'कृपालु' कहते हैं अरे मन! संसार में न सुख है, न दुःख है। अतएव संसार से उदासीन होकर श्यामसुन्दर को शरण ग्रहण कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 94-95