# छाँड़ु मन! सनक तनक सुनु बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0053-M03-K044
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 44
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 27–27

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>छाँड़ु मन! सनक तनक सुनु बात।  
<a id="line-2"></a>छिन सुख पाव पाव छिन दुख पुनि, जोरि जगत सोँ नात।  
<a id="line-3"></a>इक वस्तुहिं इक सुखी, दुखी इक, एक उदास लखात।  
<a id="line-4"></a>पुनि कहु वा वस्तुहिं सुख या दुख, या नहिं दोउ जनात।  
<a id="line-5"></a>जो जेहि वस्तु मानि सुख जितनो, सोचत रह दिनरात।  
<a id="line-6"></a>सो तेहि वस्तु पाव सुख तितनो, वस्तुहिं सुख पतियात।  
<a id="line-7"></a>पुनि तेहि विरह पाव दुख तितनोइ, निज भ्रमवश पछितात।  
<a id="line-8"></a>कह “कृपालु” जग ते उदास रहु, गहहु शरण बलभ्रात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! दुराग्रह छोड़ दे! जरा मेरी बात पर विचार तो कर। तू संसार से प्यार करके एक क्षण में तो सुखी हो जाता है एवं दूसरे ही क्षण दुःखी हो जाता है। जरा सोच तो, एक ही वस्तु से एक व्यक्ति सुखी होता है तो दूसरा दुःखी होता है एवं एक व्यक्ति उदासीन दिखाई देता है। अब तू ही बता उस वस्तु में सुख है या दुःख या दोनों ही नहीं हैं? अरे मन! जो जिस वस्तु में जितने सुख का बार-बार चिंतन करता है उसको उस वस्तु से अपना ही माना हुआ उतना सुख मिल जाता है और वह यह समझ बैठता है कि उसे उस वस्तु से ही वह सुख मिल रहा है। फिर जिस वस्तु से जिसको जितना सुख मिलता है उस वस्तु के वियोग में उसको उतना दुःख भी मिलता है। 'कृपालु' कहते हैं अरे मन! संसार में न सुख है, न दुःख है। अतएव संसार से उदासीन होकर श्यामसुन्दर को शरण ग्रहण कर।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 94-95

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
