सिद्धान्त-माधुरी · पद 43
छाँड़ु मन! ठगिनी माया आस।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhāṁd̤u mana! ṭhaginī māyā āsa
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छाँड़ु मन! ठगिनी माया आस।
2दै दै आस दिव्य सुख की तोहिं, पुनि पुनि करत निरास।
3ब्रह्मलोक पर्यन्त भोग दै, बाँधति तिरगुन पास।
4धर्म कर्म करवाय देति फल, नश्वर स्वर्गहिं वास।
5ह्वै अकाम वसुयाम श्याम भजु, करु सद्गुरु विश्वास।
6तब “कृपालु” हरि कृपा"कृपालुहिं, मिलइ प्रेम सुखरास॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! तू इस ठगिनी माया की आशा छोड़ दे। यह माया तुझे बार-बार दिव्य सुख की आशा देकर, निराश करती है। ब्रह्मलोक पर्यन्त के ऐश्वर्यों के भोग देकर तीन गुणों में बाँधती है। धर्म-कर्म करवा कर स्वर्ग देती है जो कि नश्वर है। अतएव अब तू समस्त कामनाओं को छोड़कर सद्गुरु पर विश्वास करके निरन्तर आठों याम श्यामसुन्दर का भजन कर कृपालु' कहते हैं तब कृपामय श्यामसुन्दर की कृपा से तुझे प्रेम प्राप्त हो सकेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 93-94