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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 42

छाँड़ि दे मन! अड़बंगी रीति।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhāṁd̤i de mana! ad̤abaṅgī rīti

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1छाँड़ि दे मन! अड़बंगी रीति।

2निज अड़बंगी रीति छाँड़ि मन, गहु रसिकन की नीति।

3यह नर तनु छनभंगुर याको, कहा करत परतीति।

4यह देवन दुर्लभ तन जैहैं, चार दिना महँ बीति।

5रसिक शिरोमणि नटनागर सों, करि ले निशि दिन प्रीति।

6ताते मन “कृपालु” मिटि जइहैं, सबै भीति की भीति॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू अपनी उल्टी चाल छोड़ दे एवं रसिकों की आज्ञा मान। यह मानव देह एक क्षण में नष्ट हो सकता है। इसका क्यों विश्वास करता है। क्षणभंगुर होते हुए भी यह मानव देह देवताओं को भी दुर्लभ है। यह चार दिन में बीत जायगा। अतएव रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर से निरन्तर प्रीति कर।''कृपालु' कहते हैं कि ऐसा करने से समस्त डरों के डर समाप्त हो जायेंगे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 93