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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 41

चलो मन! गहवर कुंज लतान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalo mana! gahavara kuñja latāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चलो मन! गहवर कुंज लतान।

2जहँ विहरति वृषभानुनंदिनी, अरु नँदनंदन कान्ह।

3नित नव लीला करत गौर-हरि, सँग लै ब्रज बनितान।

4सिंहासन आसीन ललिहिं पग, चापत श्याम सुजान।

5फिरत रहत गहवर गलियन महँ, करत लली गुन गान।

6मुकुट उतारि “कृपालु” धरत पग, लखि मानिनि को मान॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! गहवर वन की लता कुंजों में चल, जहाँ वृषभानुनन्दिनी राधिका एवं नन्दनन्दन श्यामसुन्दर नित्य विहार करते हैं। वे दोनों सहस्रों ब्रजांगनाओं को साथ लेकर वहाँ नित्य नवीन लीलाएँ करते हैं। सिंहासन पर बैठी हुई किशोरी जी के चरणों को श्यामसुन्दर स्वयं दबाते हैं एवं गहवर वन की गलियों में किशोरी जी के गुणों को गाते हुए घूमते रहते हैं। कृपालु' कहते हैं कि यहाँ श्यामसुन्दर स्वामिनी जी की क ग को देखकर अपने मुकुट को उतार कर उनके चरणों पर रखते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 92