# चलो मन! गहवर कुंज लतान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0050-M03-K041
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 41
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 26–26

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>चलो मन! गहवर कुंज लतान।  
<a id="line-2"></a>जहँ विहरति वृषभानुनंदिनी, अरु नँदनंदन कान्ह।  
<a id="line-3"></a>नित नव लीला करत गौर-हरि, सँग लै ब्रज बनितान।  
<a id="line-4"></a>सिंहासन आसीन ललिहिं पग, चापत श्याम सुजान।  
<a id="line-5"></a>फिरत रहत गहवर गलियन महँ, करत लली गुन गान।  
<a id="line-6"></a>मुकुट उतारि “कृपालु” धरत पग, लखि मानिनि को मान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! गहवर वन की लता कुंजों में चल, जहाँ वृषभानुनन्दिनी राधिका एवं नन्दनन्दन श्यामसुन्दर नित्य विहार करते हैं। वे दोनों सहस्रों ब्रजांगनाओं को साथ लेकर वहाँ नित्य नवीन लीलाएँ करते हैं। सिंहासन पर बैठी हुई किशोरी जी के चरणों को श्यामसुन्दर स्वयं दबाते हैं एवं गहवर वन की गलियों में किशोरी जी के गुणों को गाते हुए घूमते रहते हैं। कृपालु' कहते हैं कि यहाँ श्यामसुन्दर स्वामिनी जी की क ग को देखकर अपने मुकुट को उतार कर उनके चरणों पर रखते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 92

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
