सिद्धान्त-माधुरी · पद 40
चलु प्रेम नगर की गैल रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalu prema nagara kī gaila re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चलु प्रेम नगर की गैल रे।
2इंद्रिन विषयन हित क्यों भटकत, ज्यों कोल्हू को बैल रे।
3कोटि उपाय करे कोउ तबहूँ, पाव न सिकतहिं तैल रे।
4युग युग मथै वारि कहँ तबहूँ, पाव न कोउ घृत मैल रे।
5भुक्ति मुक्ति इन दोउन जानिय, अति ही प्रबल चुड़ैल रे।
6अब “कृपालु” मन भज उनहिंन कहँ, जो कुब्जा के छैल रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! प्रेम नगर के मार्ग पर चल। इन इन्द्रियों के विषयों के लिए तू कोल्हू के बैल के समान क्यों चक्कर खा रहा है। करोड़ों उपाय करने पर भी कोई बालू से तेल नहीं निकाल सकता एवं करोड़ों युग तक पानी को मथने पर भी कोई घी का मैल भी नहीं प्राप्त कर सकता। अरे मन! यह भुक्ति एवं मुक्ति अत्यन्त ही प्रबल चुड़ैलें हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इसलिए हे मन! कुब्जा के छैल श्यामसुन्दर का निरन्तर भजन कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 91-92