सिद्धान्त-माधुरी · पद 39
चली हौं दुलहिनि बनि ससुरार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalī hauṁ dulahini bani sasurāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चली हौं दुलहिनि बनि ससुरार।
2परम हितैषी रसिक पुरोहित, ब्याह्यो नंदकुमार।
3गुड़ियन खेल समान जानि अब, तज्यो पदारथ चार।
4चली संग लै चार कहारन, मन-बुधि चित हंकार।
5अब लौं रही कुँवारि आजु ते, भई सुहागिनि नार।
6माया काल “कृपालु” न रह जहँ, तहँ ससुरार हमार॥
हिन्दी भावार्थ
मैं दुलहिन बनकर दिव्य ससुराल जा रही हूँ। मेरे परम हितैषी रसिक रूपी पुरोहित ने श्यामसुन्दर से मेरा ब्याह करवा दिया है। अब मैंने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थो को गुड़ियों के खेल के समान जान कर छोड़ दिया है। मेरे साथ ससुराल जाते समय चार कहार हैं जिनका नाम मन बुद्धि, चित्त एवं अहंकार है। अब तक पति से अपरिचित होने के कारण कुमारी थी, आज से अनन्त काल के लिए सुहागिनी बन गयी। 'कृपालु' कहते हैं। मेरी ससुराल वहाँ है जहाँ माया, काल, आदि कभी भी प्रवेश नहीं पा सकते।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 91