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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 38

चपल चित! कत इत उत भटकात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chapala chita! kata ita uta bhaṭakāta?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चपल चित! कत इत उत भटकात।

2कूकर शूकर कीट पतंगनि, धर्यो अनंतन गात।

3अगनित सुत पति नारि बनायो, अबहुँ बनावत जात।

4तू चह परमानंद कहाँ सो? यह नहिं सोचि सकात।

5वेद पुरानन बात मान गहु, चरण शरण बलभ्रात।

6तब “कृपालु” तिन अनुकंपा ते, सब बनि जैहैं बात॥

हिन्दी भावार्थ

अरे चंचल मन! तू इधर-उधर क्यों भटक रहा है? तूने कूकर, शूकर, कोट, पतंगादि अनन्त शरीर धारण किये। अनंत स्त्री, पति, पुत्र बनाये, एवं अब भी बनाता जा रहा है। किंतु तू जिस दिव्यानंद को चाहता है, वह कहाँ है, यह नहीं सोच पाता। अरे मन सुन! वेद-पुराणादि द्वारा यह निर्विवाद सिद्ध है कि वह परमानन्द एकमात्र नँदनदंन पादारविन्द की शरणागति से ही प्राप्त हो सकता है। 'कृपालु' कहते हैं-जब तू उनके शरणागत हो जायगा तब वे अपनी अनुकम्पा द्वारा तुझे अनन्त काल के लिए आनन्दमय कर देंगे इस प्रकार तेरी सब बिगड़ी बन जायेगी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 90