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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 37

गहो रे मन! श्याम चरण शरणाई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gaho re mana! shyāma charaṇa sharaṇāī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1गहो रे मन! श्याम चरण शरणाई।

2अंत समय कोउ काम न अइहैं, मात पिता सुत भाई।

3काम, क्रोध अरु लोभ, मोह, मद, इन सों कछु न बसाई।

4यह जग मृग-तृष्णा सम दीखत, सुख लवलेश न पाई।

5धन-यौवन-तन छन-भंगुर सब, ज्योँ कपूर उड़ि जाई।

6बहुरि “कृपालु” न नर-तनु पाइय, बिगरी लेहु बनाई॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! श्यामसुन्दर,के कमल-कोमल चरण कमलों का आश्रय ले ले, क्योंकि मृत्यु के पश्चात् माता, पिता भ्राता, पुत्र आदि कोई भी स्वजन तेरा साथ न देंगे। काम, क्रोध लोभ, मोह, मद, डाह आदि से बचने का दूसरा कोई उपाय नहीं। यह संसार मृगतृष्णा के जल के समान ही है। कहीं भी, किंचित् मात्र भी सुख नहीं पा सकता। सम्पत्ति; युवावस्था एवं यह शरीर क्षण-क्षण में नष्ट हो जाने वाले हैं जैसे कपूर बिना ढके अपने आप ही थोड़ी देर में उड़ जाता है। 'कृपालु' कहते हैं कि-रे मन! बार-बार नहीं मिलेगा, शीघ्र ही अनादि काल की बिगड़ी बना ले, अर्थात् इसी क्षण श्यामसुन्दर की शरण हो जा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 89-90