सिद्धान्त-माधुरी · पद 36
गयो ब्रज माहिं ब्रह्म बौराय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gayo braja māhiṁ brahma baurāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1गयो ब्रज माहिं ब्रह्म बौराय।
2जो अदृष्ट, अग्राह्य, अलक्षण, अव्यवहार्य कहाय।
3सोइ चंचल माखन हित यशुमति, अंचल गहि बिरुझाय।
4जो इंद्रिय-मन-बुधि-अतीत अस, चारिहुँ वेद बताय।
5सोइ छछिया लौं छाछ हेतु ब्रज, थेइ थेइ नाच नचाय।
6कहँ लौं कहिय “कृपालु” जाय बलि, चौर जार पद पाय॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रज में सर्वव्यापक ब्रह्म भी पागल हो गया है। वेदों ने जिस ब्रह्म को अदृष्ट (जिसे कोई देख न सके), अग्राह्य (जिसे कोई पकड़ न सके), अलक्षण्य (जिसका लक्षण न हो सके), अव्यवहार्य (जो व्यवहार में न लाया जा सके) कहा है, वही ब्रह्म चंचल बनकर मक्खन के लिए यशोदा मैया का अंचल पकड़ कर मचल रहा है। जिस ब्रह्म को वेदों ने इन्द्रिय मन, बुद्धि से अतीत बताया है, वही ब्रह्म ब्रजांगनाओं की छछिया भर छाछ के लिये थेइ-थेइ कह कर नाच रहा है। कृपालु' कहते हैं कि कहाँ तक कहूँ वही ब्रह्म ब्रजदेवियों के द्वारा चोर जार की उपाधि पा कर बलिहार जा रहा है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 88-89