# गहो रे मन! श्याम चरण शरणाई।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0046-M03-K037
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 37
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 24–24

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गहो रे मन! श्याम चरण शरणाई।  
<a id="line-2"></a>अंत समय कोउ काम न अइहैं, मात पिता सुत भाई।  
<a id="line-3"></a>काम, क्रोध अरु लोभ, मोह, मद, इन सों कछु न बसाई।  
<a id="line-4"></a>यह जग मृग-तृष्णा सम दीखत, सुख लवलेश न पाई।  
<a id="line-5"></a>धन-यौवन-तन छन-भंगुर सब, ज्योँ कपूर उड़ि जाई।  
<a id="line-6"></a>बहुरि “कृपालु” न नर-तनु पाइय, बिगरी लेहु बनाई॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! श्यामसुन्दर,के कमल-कोमल चरण कमलों का आश्रय ले ले, क्योंकि मृत्यु के पश्चात् माता, पिता भ्राता, पुत्र आदि कोई भी स्वजन तेरा साथ न देंगे। काम, क्रोध लोभ, मोह, मद, डाह आदि से बचने का दूसरा कोई उपाय नहीं। यह संसार मृगतृष्णा के जल के समान ही है। कहीं भी, किंचित् मात्र भी सुख नहीं पा सकता। सम्पत्ति; युवावस्था एवं यह शरीर क्षण-क्षण में नष्ट हो जाने वाले हैं जैसे कपूर बिना ढके अपने आप ही थोड़ी देर में उड़ जाता है। 'कृपालु' कहते हैं कि-रे मन! बार-बार नहीं मिलेगा, शीघ्र ही अनादि काल की बिगड़ी बना ले, अर्थात् इसी क्षण श्यामसुन्दर की शरण हो जा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 89-90

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
